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    बैंक इम्पलाईज फेडरेशन, बिहार का 14वां राज्यस्तरीय सम्मलेन

बैंक इम्पलाईज फेडरेशन, बिहार का 14वां राज्यस्तरीय सम्मलेन

 

बैंक इम्पलाईज फेडरेशन, बिहार का 14वां राज्यस्तरीय सम्मलेन 


बैंक इम्पलाईज फेडरेशन, बिहार का 14वां सम्मलेन पटना स्थित बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन सभागार में सम्पन्न हुआ। सम्मलेन की अध्यक्षता श्री बी प्रसाद ने किया। सबसे पहले स्वागत समिति के अध्यक्ष तथा सी आई टी यू के नेता श्री अरुण कुमार मिश्र ने राज्य-भर से आये 250 से अधिक प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए महगाई, बेरोजगारी तथा आर्थिक विषमता बढाने वाली केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों के विरुद्ध मजबूत प्रतिरोध आन्दोलन का आह्वान किया।   

सम्मलेन का उद्घाटन करते हुए बैंक इम्पलाईज फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के महासचिव श्री देबाशीष बसु चौधुरी ने कहा की 1990 के दशक में नव-उदारवादी नीतियों की शुरुआत के बाद से, क्रमिक सरकारों ने  "सुधारों" की आड़ में सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था को खत्म करने का प्रयास किया है, और वित्तीय समावेशन, रोजगार सृजन, ग्रामीण ऋण तथा राष्ट्रीय विकास में PSBs की ऐतिहासिक भूमिका की अनदेखी की है। भाजपा (और उसके पूर्ववर्ती जनसंघ) ने लगातार बैंकों के राष्ट्रीयकरण का विरोध किया है और कॉर्पोरेट नियंत्रण का समर्थन किया है; यह एक ऐसी नीति है जिसे अब विलय, विनिवेश और रणनीतिक बिक्री के माध्यम से आक्रामक रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। यह दावा कि विलय से "वैश्विक स्तर के बैंक" बनेंगे, भ्रामक है और तथ्यों द्वारा समर्थित नहीं है; जबकि विलय के वास्तविक परिणाम शाखाओं का बंद होना, नौकरियों का जाना, सेवाओं में व्यवधान, आउटसोर्सिंग और आम लोगों के लिए सुलभ बैंकिंग से वंचित होना रहे हैं। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB) में प्रस्तावित IPO और विनिवेश ग्रामीण ऋण और सार्वजनिक नियंत्रण के लिए और भी बड़ा खतरा पैदा करते हैं। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में विनिवेश, विलय, निजीकरण के सभी रूपों का विरोध के साथ साथ राष्ट्रीय हित में बैंकों के सार्वजनिक स्वामित्व, रोजगार सुरक्षा और जनोन्मुख बैंकिंग की रक्षा के लिए अपने एकजुट संघर्षों को और तेज करने का आह्वान किया 

उन्होंने आगे बताया कि बैंको के व्यवसाय और मुनाफे में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। लेकिन दिनोदिन नयी सरकारी योजनाओं के लागू होने के कारण कर्मचारियों पर काम का बोझ कई गुना बढ़ गया है। इसके कारण ग्राहक सेवा तथा काम की गुणवत्ता में कमी आई है। ग्राहक सेवा के नाम पर कर्मचारियों को ग्राहकों के साथ-साथ प्रबंधन के कोप का सामना करना पड़ता है। लिपिकों की भारी कमी है। अधीनस्थ कर्मचारी तो दुर्लभ प्रजाति जैसे हो गए हैं। अस्थायी दैनिक 



कर्मचारियों का अमानवीय शोषण हो रहा है। जाबलेस ग्रोथ और मुनाफाखोरी के इस प्रवृति के विरुद्ध आन्दोलन ही एकमात्र विकल्प है। 


मुख्य अतिथि तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के विधि संकाय के प्राध्यापक डा. अखिलेन्द्र कुमार पाण्डेय ने श्रम-संहिताओं के खतरों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा, काम के घंटों को नियमित करने और न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने के  लिए श्रम कानून बनाए गए थे जिसके माध्यम से सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में निवेश, उचित वेतन को बढ़ावा देना और समावेशी विकास सुनिश्चित करने वाली नीतियाँ बनायीं गयी थी और मजदूर वर्ग को कुछ अधिकार हासिल हुए थे। लेकिन भारत सरकार 29 श्रम कानूनों को समाप्त कर चार नयी श्रम-संहिताओं के क्रियान्वयन के लिए तैयार हैं। ये संहिताएँ श्रमिक वर्ग को गुलाम बनाने तथा लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों पर अंकुश लगाकर नवउदारवाद के खिलाफ सभी विरोधों को दबाने का एक क्रूर निर्णय है। इनका उद्देश्य प्राकृतिक और सार्वजनिक संसाधनों की कॉर्पोरेट लूट और श्रमिकों का क्रूर शोषण करना है । इसका उ‌द्देश्य न केवल श्रम लागत को कम करना है, बल्कि ट्रेड यूनियनों को कमजोर और खत्म करना है। 

उन्होंने आगे बताया की व्यापार करने में आसानी के नाम पर मालिकों द्वारा श्रम कानूनों के उलंघन पर अपराधिक दंड के कई प्रावधानों को समाप्त कर दिया गया है। यह नियोक्ताओं  को श्रमिकों के अधिकारों, जीवन और आजीविका के पहलुओं और उपभोक्ताओं के अधिकारों को रौंदने और नियोक्ता वर्ग, अमीरों और बड़े व्यापारिक वर्गों के हितों को सुरक्षित करने की अनुमति देगा। दूसरी ओर यूनियनों, उसके पदाधिकारियों और सदस्यों द्वारा विरोध प्रदर्शनों एवं अन्य कई गतिविधियों को संगठित अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया है और इसके तहत लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले ट्रेड यूनियनों या संगठनों के खिलाफ हथियार के रूप में किया जा सकता है। हड़ताल का अधिकार श्रमिकों के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपकरण है। ट्रेड यूनियनों को संगठित करने का अधिकार और हड़ताल के अधिकार सहित सामूहिक कार्रवाई का अधिकार श्रमिक वर्ग के अविभाज्य और अब स्थापित अधिकार हैं। औ‌द्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 ने हड़ताल करने के इस अधिकार की रक्षा की थी। अब कर्मचारी तब 


तक हड़ताल पर नहीं जा सकते जबतक कि हड़ताल से 60  दिन पहले नियोक्ता को हड़ताल का नोटिस न दिया जाए और यदि सुलह की कार्यवाही चल रही हो तो कोई हड़ताल नहीं की जा सकती। 


उन्होंने मज़दूर वर्ग के कठिन परिश्रम से अर्जित अधिकारों की रक्षा के लिए एक जुट संघर्षों को और तेज़ करने और मज़दूरों की चेतना को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया ताकि वे अपने अधिकारों पर हमलों और सरकार द्वारा अपनाई जा रही नवउदार वादी नीतियों के बीच के संबंध को समझ सकें ताकि एक जुट हो कर श्रम संहिताओं का मज़बूत विरोध किया जा सके।


सम्मलेन में महासचिव श्री रंजन राज के द्वारा प्रस्तुत कार्यकारिणी समिति का प्रतिवेदन सर्व-सम्मति से पारित हुआ। साथ ही साथ श्री सुधीर कुमार सिंह ने आय-व्यय का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जिसे सर्व-सम्मति से पारित किया गया।

सम्मलेन में बैंको के निजीकरण तथा श्रम संहिताओं के विरुद्ध एवं नयी नियुक्तियों, अस्थायी कर्मचारियों की सेवा नियमित करने, नयी पेंशन योजना की समाप्ति एवं पुरानी पेंशन योजना के पुनर्बहाली के समर्थन में प्रस्ताव पारित करते हुए संघर्ष का निर्णय लिया गया।


अंत में सर्वसम्मति से नयी कार्यकारिणी समिति का निर्वाचन हुआ जिसमे श्री बी प्रसाद अध्यक्ष, श्री रंजन राज महासचिव तथा श्री सुधीर कुमार सिंह कोषाध्यक्ष निर्वाचित किये गए।

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